हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारी का निलंबन कोई दंड या सजा नहीं है, बल्कि यह विभाग की एक प्रक्रियात्मक कार्रवाई है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने याचिकाकर्ता के निलंबन आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि सीसीएस और सीसीए नियमों के नियम 10 के तहत किसी कर्मचारी को निलंबित करने से पहले कारण बताओ नोटिस जारी करने की कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर याचिकाकर्ता की बेगुनाही या दोष की जांच नहीं की जा सकती, क्योंकि अभी विभागीय जांच होनी बाकी है। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने कानून के तहत उपलब्ध अपील के अधिकार का प्रयोग नहीं किया। सीसीएस-सीसीए नियमों के नियम 23(i) के तहत निलंबन के खिलाफ अपील की जा सकती है, जिसे याचिकाकर्ता ने नजरअंदाज कर सीधे कोर्ट का रुख किया। इसके साथ ही अदालत ने विभाग को अपनी जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता है।
कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर याचिकाकर्ता की बेगुनाही या दोष की जांच नहीं की जा सकती, क्योंकि अभी विभागीय जांच होनी बाकी है। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने कानून के तहत उपलब्ध अपील के अधिकार का प्रयोग नहीं किया। सीसीएस-सीसीए नियमों के नियम 23(i) के तहत निलंबन के खिलाफ अपील की जा सकती है, जिसे याचिकाकर्ता ने नजरअंदाज कर सीधे कोर्ट का रुख किया। इसके साथ ही अदालत ने विभाग को अपनी जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता है।
याचिकाकर्ता एक सरकारी कर्मचारी है। उसे विभाग की ओर से अनुशासनात्मक कार्रवाई के मद्देनजर निलंबित कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि वह आउटसोर्स कर्मचारियों के वेतन भुगतान के लिए जिम्मेदार नहीं था और उसे निलंबित करने से पहले कोई कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया गया। उन्होंने इस कार्रवाई को भेदभावपूर्ण और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था। याचिकाकर्ता ने अदालत में याचिका दायर कर 27 अप्रैल 2026 को जारी अपने निलंबन आदेश को रद्द करने की मांग की थी।
कंपनी के पार्टनर पर केस चलाने के लिए स्पष्ट आरोप होना अनिवार्य : हाईकोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने वीएडीएसपी फार्मास्यूटिकल्स और उसके भागीदारों के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत व उसके बाद की कार्रवाई को रद्द कर दिया है। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी फर्म के भागीदारों को केवल उनके पद के आधार पर तब तक जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जब तक शिकायत में उनके विशिष्ट कार्यों और कंपनी के दैनिक कामकाज में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका का स्पष्ट उल्लेख न हो। अदालत ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, नालागढ़ (बद्दी) की अदालत में लंबित शिकायत और उसके तहत शुरू की गई कार्रवाई को रद्द कर दिया गया है। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता कंपनी के अन्य प्रतिवादी केवल फर्म के पार्टनर थे। फर्म ने पहले ही एनालिटिकल केमिस्ट को तकनीकी इंचार्ज और व्यावसायिक लेनदेन के लिए जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में नियुक्त किया था।
चूंकि शिकायत में भागीदारों की दैनिक गतिविधियों में संलिप्तता का कोई विवरण नहीं था, इसलिए उन्हें दोषी नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने कहा कि यदि इस मामले को जारी रखने की अनुमति दी जाती है, तो यह याचिकाकर्ताओं के लिए एक लंबी और निष्फल कानूनी प्रताड़ना होगी, क्योंकि अभियोजन पक्ष के पास उनके खिलाफ ठोस आधार नहीं है।अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यह प्राथमिक जिम्मेदारी शिकायतकर्ता (ड्रग इंस्पेक्टर) की है कि वह यह साबित करने के लिए पर्याप्त तथ्य पेश करे कि आरोपी फर्म के कामकाज का प्रभारी था। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि नमूनों को सरकारी विश्लेषक के पास भेजने और रिपोर्ट प्राप्त करने में अत्यधिक देरी की गई, जो ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की धारा 23 और 46 का उल्लंघन है।
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